हाथ में लेखनी उठा लीजिए, दिल में ज्वाला जगा लीजिए..

शाहजहांपुर। विद्रोही स्मृति न्यास द्वारा राष्ट्रीय कवि दामोदर स्वरूप विद्रोही की स्मृति में काव्य संध्या का आयोजन साउथ सिटी में किया गया। इसमें कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कर विद्रोही को श्रद्धांजलि दी। कवि और रंगकर्मी डॉ. अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ने वीर रस की कविताएं सुनाईं हाथ में लेखनी उठा लीजिए। दिल में ज्वाला जगा लीजिए। सोई कौम को जगाने की खातिर, लहू की स्याही बना लीजिए।

गोष्ठी के अध्यक्ष वरिष्ठ कवि ज्ञानेंद्र मोहन ‘ज्ञान’ ने नवगीत सुनाया कि यूं ही दर्पण के सम्मुख जा खड़े हो गए हम, हमने आज खंगाला अपने भीतर का मौसम। आक्रोश के कवि सुशील दीक्षित ‘विचित्र’ ने गजल सुनाया कि गिनते-गिनते कई मशीनें फेल हुईं, कितने चढ़े नकाब हमारे शहरों में। वरिष्ठ गीतकार बृजेश मिश्रा गीत सुनाया- अल्लड़ उन्मादी सी चढ़ती जवानी सी, बही प्रतिबंध सभी तोड़ कर नदी। वहां गई पर्वत को छोड़कर नदी। नवगीतकार डॉ. प्रशांत अग्निहोत्री ने गीत सुनाया जिंदगी तुम बिन मरुस्थल, रेत कण, ताप से अभिशप्त सूखा एक तृण। आ भी जाओ, है जरूरत एक सावन की।

कवि डॉ. इन्दु ‘अजनबी’ ने गीत सुनाया-धूल थी, आंधियां ग्रीष्म की बात थी। साथ तुम थीं तो मौसम सुहाना लगा। बाहरी दृष्टि से देखा नई तुम लगीं, मन की आंखों से परिचय पुराना लगा। कवि कौशलेंद्र मिश्र, आशीष त्रिपाठी और प्रमोद अग्रवाल ने भी काव्य पाठ किया। गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रुप में उपस्थित समाजसेवी राजीव गुप्ता ने कहा कि दामोदर स्वरूप विद्रोही ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से जनपद का नाम रोशन किया।

साहित्य की जो कीर्ति उन्होंने प्राप्त की उस पर हम सबको गर्व है। इससे पूर्व सभी अतिथियों ने दादा विद्रोही के चित्र के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। गोष्ठी का संचालक डॉ. प्रशांत अग्निहोत्री, संयोजक विवेक विद्रोही, सोहन लाल तिवारी, सुमन गुप्ता आदि मौजूद रहे।

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